Thursday, 15 August 2019

गांधीगिरी | Gandhigiri

"गांधी" शब्द किसी 'नाम' की प्रामणिकता का वो आधार है जो खास को आम से अलग करता है।यह परिचय है उस महान संस्कृति की  जिसका प्रतिनिधित्व लंगोट,लाठी,और चश्मे वाले एक फ़क़ीर ने किया और "गांधीगिरी" की ऐसी  मिशाल पेश की कि पूरी दुनिया मंत्रमुग्ध हो गयी।यह वही गांधी है जिसने अंग्रेजो को भी गांधीगिरी सीखा दिया और जो अमन और शांति का प्रतीक बन "सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय" को धरातल पर फलीभूत किया ।यह पहचान भी है,अभिमान भी है,संस्कार भी है,सहशीलता भी है,स्वभाव भी है और धर्म भी है तभी तो ग्रंथो में लिखित "अहिंसा परमो धर्म" हमारी गौरवशाली परंपरा का हिस्सा रही है।उपरोक्त बातों का सार निकाला जाए तो गांधी एक शब्द ही नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा एक 'विचार' है ,एक चिंतन है और एक निश्चल जीवनप्रणाली का आधार स्तंभ है।

मंथन 

वक़्त बदला, सोच बदले, सभ्यताओं का आधुनिकीकरण शुरू हुआ,कदम से कदम मिलाकर चलने वाले दौर बदले और Fast and Furious का जमाना आ गया,संचार के माध्यम विकसित हुए,Social Media क्रान्ति हुई ,विचारो का आदान-प्रदान सुलभ हुआ और इन सबके बीच जो एक बड़ा परिवर्तन हुआ वो है मनुष्य का नैतिक और चारित्रिक पतन। मुद्दा राजनीतिक है तो राजनीति की ही बात करूंगा परंतु ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दरकिनार नहीं किया जा सकता है क्योंकि राजनीति का एक उत्कृष्ट मापदंड है चरित्र और नैतिकता।इन दोनों से फिसले तो राजनीति भी हाथ से फिसलने लगती है।
मोदी Vs गांधी का तुलनात्मक विश्लेषण सर्वथा अनुचित है परंतु गांधीगिरी की वैचारिक प्रसांगिकता को कहीं न कहीं ठेस पहुँची ,कोई आघात  हुआ,जैसे प्रकृति अपना नियम कानून खुद बनाती  ठीक से प्रकार राजनीति भी अपनी नीति और सिद्धान्त खुद तय करती है,राजनीति को भी अपना वजूद बरकरार रखना होता है तभी तो गांधी नाम रखने वाले से ज्यादा गांधीगिरी जीने वाले किसी 'मोदी' का उदय होता है।गांधी के नाम पर दशकों शासन करने वाले शायद गांधीगिरी भूल गए ,शायद वो विचाधारा कहीं पीछे छूट गई  जो राष्ट्रहित की बात करती थी या फिर गुमान हो गया गांधी होने पर और चकाचौंध में जीने वाले "गांधीगिरी की लौ" को सम्हाल कर नहीं रख  सके।दुष्यंत कुमार की कविता बड़ी सटीक होती  है :-
"हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए"।
जब बात देशहित की हो,जब बात समाज की हो और जब बात अवाम की हो तो प्रश्न तो उठेंगे ही कि 353 के बड़े स्कोर को पीछा करने वाली कांग्रेस 55 पर ही धराशाई  क्यों हो गई? प्रश्न तो यह भी उठेंगे एक आल राउंड गांधीगिरी से भरी कांग्रेस जो कभी बीजेपी को 1 का स्कोर भी करने नहीं देती थी आज वो इतना बड़ा स्कोर खड़ा कैसे कर रही है?अटल जी याद आते  हैं :-
हार नहीं मानूँगा ,रार नहीं ठानूँगा ,
काल के कपाल पर लिखता हूँ मिटाता हूँ ,
गीत नया गाता  हूँ। 
दो निष्कर्ष निकाले जा सकते है या तो BJP ने गांधीगिरी को निभाया या कांग्रेस ने गाँधीगरी का त्याग किया या ये भी हो सकता है कि दर्शकदीर्घा में बैठे वो लोग जिन्हें हमेशा गांधीगिरी के नाम पर भ्रमित किया गया आज शायद गांधीगिरी के सही मायने को समंझने लगे हों।मेरी सहमति तीसरे  विचार से है।
वो कांग्रेस जो 60-65 सालों तक हिंदुस्तान के राजनीति कि केन्द्रबिन्दु रही आज किनारे पर भी बड़ी मुश्किल से नज़र आती है।ऐसे में राष्ट्रकवि दिनकर जी का स्मरण होता है:-
सदियों की ठंडी-बुझी राख सुलग उठी ,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,
दो राह,समय के रथ का घर्घर -नाद सुनो ,
सिंघासन ख़ाली करो की जनता आती है। 

निष्कर्ष 

मुद्दा चाहे न्याय का हो,साम्प्रदायिकता का हो,किसान का हो,विकास का हो,घोटालों का हो,राज्यो का हो,देशनीति की हो,विदेशनीति की हो,370 का हो,ट्रिपल तलाक  हो  या राफेल का हो हर मुद्दे पर  हँस कर या फिर आँख मारकर भारत की संसदीय अस्मिता का उपहास उड़ाने वाले को जनता कब तक बर्दाश्त करती! कब तक बर्दाश करती उन चाटुकारो की नीति को जिसने आम नागरिक के जीवन को हासिये पर धकेल दिया वर्ना ऐसा कौन सा संसाधन नहीं था  कि हिंदुस्तान 60 सालो तक शुद्ध पानी को तरसता रहा,ऐसा कौन पोषण नीति नहीं था कि साल दर साल नौनिहाल  कुपोषण का शिकार होता रहा,ऐसा कौन सा ज्ञान नही था की अज्ञानता चहुओर  डेरा डाली हुई थी,आखिर वो कौन से युद्ध कला नही  थी कि हम 1962 का युद्ध हार गए| चाणक्य,आर्यभट्ट,जगदीश चंद्र बोस ,अशोक,तानसेन,शिवाजी, सी वी रमन न जाने कितने की विधा के पारंगत इस मिट्टी  की पहचान थे फिर भी  हम एक कृतज्ञ राष्ट्र नहीं बन पाये।
'कमी नीति में नहीं नियत में थी',जो आज के दौर में अत्यधिक ही झलक रहा है।परंतु भूलना नहीं चाहिए कि हम सूचना क्रांति के दौर में है,"झूट छुप नही सकता और सच्चाई बहुत दिनों तक दबाई नही  जा सकती"।

घनिष्ठता इटली से भी रखिये पर नमक की कीमत जरूर अदा कीजिये।जनेऊ पहन मंदिर-मंदिर और फिर जनेऊ उतार मस्जिद-मस्जिद से ज्यादा जरूरी है देशहित के विचारों को निर्भीक होकर रखने का,सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखने का।इसके लिए जरूरी है कि सोच सही हो।इस धर्मयुद्ध में आज कृष्ण की चेतावनी को अर्जुन समझे और जिम्मेदार बने तो ही जीत होगी नहीं तो कोई नही जीतेगा,सब लोग हारेंगे,इंसानियत हारेगा।
चायवाले को शायद ये बेहतर समझ है,मानवता ,राष्ट्रप्रेम,दृढ़संकल्प से गाँधीगरी को जिया जा सकता है तभी तो हिचक नहीं  होती निर्णय लेने में,तभी तो आशा की  लौ लिए हिंदुस्तान को मोदी के रूप में एक उदयीमान सूर्य दिख रहा है।
                     व्यक्तिगत असहमति जायज  है किन्तु देश से असहमति नही हो सकती

आभार
AUGUST KRANTI |अगस्त क्रांति,सोने की चिड़ियाँ,Blogging,बचपन(भाग१)



Saturday, 10 August 2019

AUGUST KRANTI |अगस्त क्रांति

AUGUST KRANTI

"आज़ादी" बहुत कीमती शब्द है साहब!ये शब्द से कहीं ज्यादा वो भावना है जो रह-रह कर अटखेलियां लेती है,इतराती है और जमीं से आसमां तक अपने वजूद होने का एहसास कराती है। निरन्तर कुर्बानियां देनी पड़ती है तब जाकर मन आज़ाद होता है,तन आज़ाद होता है,विचार आज़ाद होता है,कलम आज़ाद होती है,भाव आज़ाद होता है,आशा और उम्मीद आज़ाद होती है,स्वाभिमान आज़ाद होता है अर्थात हर वो प्राण आज़ाद होता है जो जीवंत रहना चाहता है।ऐसी ही एक कहानी है "मदर-ए-वतन" हिंदुस्तान की।
      "मन समर्पित ,तन समर्पित और ये जीवन समर्पित,
         चाहता हूँ देश की धरती,तुझे कुछ और भी दूँ"।
  'यूँ ही नहीं स्याही से लिखे ये शब्द कागज को अमर कर देते हैं,
यूँ ही नहीं पुरुषार्थ से भरे ये जज्बात ,वीरता को अमर कर देते हैं'।
Blogging सोने की चिड़ियाँ

15th August

'AUGUST' हिंदुस्तान के इतिहास का वो महीना है जो सावन भी है और बसंती भी है,जिसमें  राम भी है और  शिवभक्ति भी है,जिसमें गंगा भी है और आरती भी है,जिसमें आरम्भ भी है और अंत भी है,जो एक सोच भी है और विचारों का उन्माद भी है,जिसमें त्याग भी है और त्योहार भी है, तभी तो ये हिन्दुतान के स्वर्णाक्षरों का "अगस्त क्रांति" कहलाता  है। इस महीने में आज़ाद हिंदुस्तान का 'मुस्तकविल' माँ भारती के चरणों में नतमस्तक था।
आज़ादी के उपवन में जो फूल महक रहे हैं वो जलियांवाला बाग के लोगों खून से सिंचित है,वो उन महान वीर एवं वीरांगनाओ के लहु का प्रमाण है जिन्होंने इस भूमि को उर्वरा बनाया । ये वो दौर था जब आज़ादी के दीवाने 'बसंती चोला' लिए भारत माँ को आज़ाद करने के लिए मौत की'आँखों में आँखें' डाल "इंक़लाब-जिंदाबाद" के नारों को बुलंद कर रहे थे।
कौन भूल सकता है 24 साल के जतिन्द्रनाथ दास को जिन्होंने लाहौर की जेल में 64 दिन भूख हड़ताल कर अपने प्राणों की आहुति दे दी।कौन भूल सकता है खुदीराम बोस को जिन्हें 18 साल की उम्र में फाँसी दे दी गई।भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को जिन्होंने 8 अप्रैल 1929 को 'Delhi Central Legislative Assembly'में धुंआ बम फेंका और  "इंक़लाब-जिंदाबाद"के नारे लगते हुए बेखौफ खुद की गिरफ्तारी दी। मकसद  बहुत पारदर्शी और स्पष्ट थे-"If the deaf are to hear,the sound has to be very loud".
क्या जवानी थी, क्या रवानी थी कि मौत भी उनलोगों को डरा न सका और" मोहे रंग दे बसंती चोला" गाते हुए 23 मार्च 1931 की सुबह भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने हँसते हुए फाँसी के फंदों को गले लगा लिया मानो कोई स्वर्णाभूषण हो,मानो कोई श्रृंगार हो,मानो कोई अर्पण हो,मानो कोई तर्पण हो,जो समर्पित थी गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी माँ भारती को आज़ाद करने को।
"मेरा नाम आज़ाद है,पिता का नाम स्वतंत्रता है और पता जेल है"यह परिचय ही  काफी था अंग्रेजी हुकूमत की नसें ढीली कर देने वाले बहुरूपिया चंद्रशेखर आज़ाद की।"तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा",किसी चिंगारी से कम नहीं जिसने लाखों युवाओं को चलता फिरता विचारशील बारूद के ढेर में बदल दिया,ऐसी थी आज़ाद खयाल की बेबाकी और ओज।झांसी की रानी ,मंगल पांडेय,बाल गंगाधर तिलक,वीर सावरकर, तात्या टोपे तथा ऐसे कितने ही भारत माँ के लाल थे जिन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।उस माँ,उस पिता ,उस बहन,उस अर्धांगिनी को भी सलाम जिन्होंने निजस्वार्थ त्याग अपने  बेटे ,अपने भाई और अपने पति को भारत माँ के चरणों में समर्पित कर दिया।
" धन्य है वो धरा जिसका सपूत वतन पे मरा, धन्य है वो     धरा, धन्य है वो तिरंगा,धन्य है वो प्रसूता माता,
   कतरा-कतरा ख़ून से जहाँ माँ का कर्ज चुकाया जाता"।
कुछ कटु सत्य कभी किसी हिंदुस्तानी को नहीं भूलना चाहिए,क्योंकि जो देश अपने बलिदानियों,क्रांतिकारियों का सम्मान नहीं करता उसका पतन सुनिश्चित है।आज़ादी तो 21 Oct 1943 को ही मिल जाती जब "आज़ाद हिंद फौज "के नायक सुभाष चंद्र बोस ने पूरे नार्थ ईस्ट को अपने कब्जे में ले लिया था और उसे 'आज़ाद' घोषित ही नहीं किया अपितु बैंक खोले,करेंसी जारी की।परंतु ऐसा क्या हो गया कि 1947 आते आते "नेता जी" गायब हो गए,प्लेन Crash हो गया? प्रश्न अभी भी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है।
पर एक बात तो सच है कि कुछ कुंठित विचारों ने अंग्रेजी नमक इतना खाया था कि भारत माँ के स्वतंत्रता के मिठास को हल्का कर गया।
               "दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल,
                साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल"।
कवि प्रदीप द्वारा रचित और लता जी की सुरीली आवाज इसे बेहद कर्णप्रिय बनाती है ,पर इस गाने की भावनाओं से मेरी आंशिक सहमति है। 'खडग बिना ढाल' के आज़ादी नहीं मिलती और 'शक्ति' के बिना सम्मान नहीं मिलता।
     "क्षमा शोभती उस भुजंग को,जिसके पास गरल हो,
     उसको क्या जो दंतहीन,विषरहित ,विनीत सरल हो"।

Independence

खैर,आज़ादी के जश्न में वो त्याग,वो समपर्ण,वो वीरता ,वो शौर्य,वो पुरुषार्थ हर हिंदुस्तानी को याद रखना चाहिए और ध्यान रखना चाहिये कि ये आज़ादी निरंतर हमारे वीर महापुरुषों,हमारे वीर जवानों के त्याग का परिणाम है।
सभी को स्वतंत्रता दिवस ही ढेर सारी शुभकामनाएं।
   "जो भरा नहीं है भावों से,जिसमे बहती रसधार नहीं,
   हृदय नहीं वो पत्थर है , जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं"।
बचपन(भाग१) बचपन(भाग-२)

जय हिन्द ,
वन्देमातरम   

Tuesday, 6 August 2019

स्वराज

वैसे तो मेरी अनुभहीनता मेरी लेखनी के रास्ते का रोड़ा हमेशा बनती है पर पिछले 4-5 दिनों से ये किसी ऊंचे टीले से कम नहीं,जहाँ मेरी भावनाएं ,मेरे विचार उस ऊंचाई के सामने बौना साबित हो रहा।सामान्यतः मैं एक कॉलम कुछ घंटों के मेहनत के बाद लिख लेता हूँ पर आज चौथा दिन है जब मैं वाक्य के पांचवे पूर्णविराम से आगे  लिखने में कठनाई महसूस कर रहा हूँ।बचपन से जिस विषय पर  निबंध लिखता आया,भाषण देता आया उस 15 अगस्त पर आज लिखना मेरे लिए किसी भावनात्मक गुलामी से कम नहीं जहाँ मेरे शब्द मेरे विचारों का साथ नहीं दे रही।
"Freedom at Midnight", "Gandhi or boss " और  कुछ अन्य आलेख पढ़ अपनी आज़ाद लेखनी को धार देने की पूरी कोशिश कर रहा था।लेकिन पिछले दो दिनों से नरेंद्र मोदी जी और आज "राजनीति की सुषमा" जी ने मेरी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।
#15 August,#Article 370 और आज #सुषमा जी का देहावसान,समझना कतिपय कठिन नहीं कि मेरे लिए ये कितना असमंजस भरा वक़्त है।क्या लिखूं,कहाँ से शुरू करुँ और कहा अंत करूँ कुछ नहीं समझ आ रहा।काफ़ी जद्दोजेहद के बाद निर्णय लिया कि आज सुषमा के "शर्मा से स्वराज" बनने की कहानी लिखूँ।
#सफल बचपन #सफल ncc cadet#सफल शिक्षा #सफल वकील #सफल प्रेम विवाह,#सफल गृहणी#सफल पत्नी#सफल माँ# सफल सांस्कृतिक पहचान#सफल प्रथम BJP की महिला प्रवक्ता#सफल मुख्यमंत्री#सफल विदेश मंत्री और इन सबसे ऊपर एक प्रखर वक्ता और एक सफल इंसान शायद कम पड़ जाए "स्वराज" को वर्णन करने के लिए।
स्वराज कॉल से शादी कर सुषमा शर्मा का स्वराज बन जाना और फिर माथे में सिंदूर,गले मे मंगसलसूत्र और भारतीय परिधान ,कितनी गौरवान्वित होती होगी भारतीय संस्कृति।
राजनीति की ऐसा कोई कला नहीं जिसे सुषमा जी ने  गढ़ा नहीं ,शायद इसलिए ही तो विपक्षी भी उनके कायल थे।
कौन भूल सकता है संयुक्त राष्ट्र में उनका अमिट भाषण जहाँ उन्होंने हिंदी का सर ऊंचा ही नहीं किया अपितु पाकिस्तान की धज्जियां उड़ा दी।भारतीय विदेशनीति को एक अलग ऊंचाई दे भारत की विश्वप्रतिष्ठा को नया मुकाम दे गईं 'स्वराज'।महिला सशक्तिकरण का एक नायाब उदारण थी 'स्वराज'।
खैर,राजनीति के सुषमा का चले जाना जैसे भारतीय राजनीति के प्राकृतिक सौंदर्य का चले जाने जैसा है। भारतीय राजनीति का ये खालीपन शायद ही पूर्ण हो।जो भी हो एक बार फिर ये बात सच हो गई कि अच्छे लोगो की आयु कम होती है शायद भगवान को उनकी ज्यादा जरूरत महसूस होती होगी।
आज़ादी की बात जल्द करूँगा फिलहाल अंतर्मन से स्वराज जी को "श्रद्धांजलि"।
            ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
            उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
आभार।

Saturday, 3 August 2019

Blogging

हिंदी का श्रृंगार और उसका आलिंगन हाल के दिनों तक मेरे लिए सिर्फ उपहास का विषय था।सोचता था आज के इस आपा-धापी और खचाखच भरी  भीड़-भाड़ में कहीं मेरी  हिंदी का मान-मर्दन न हो जाये,कहीं वो कथित 'Mob Lynching' का शिकार न हो जाये। Software और Western Lifestyle के इस दौर में कहीं मेरी हिंदी किसी Window XP की तरह Out of Dated न हो जाये ,साथ ही साथ सादगी और शालीनता की पहचान हम सब की हिंदी किसी Jeans -Top और मटक-मटक कर चलने वाली 'English-Winglish' के सामने जलील न हो जाये। इस डर ने मेरी शब्दों,भावनाओं को कैद एवं कलम को अर्थहीन बना दिया था। यह सच भी है कि आज के दौर में वास्तविकता से परे हिंदी की प्रामाणिकता से कुठाराघात किया गया। खैर,सच्चाई जो भी हो देश आजाद है, सो कलम को भी उतनी ही स्वतंत्रता है।
हिंदी के बड़े-बड़े धुरंधरों को जब पढ़ता हूँ तो हँसी,खुशी,गम,आंसू,विचारशून्य,विचारशील इत्यादि जैसे अनेकानेक  आव-भाव   क्रमशः शब्दों की गतिशीलता  के हिसाब से बदल रहे होते हैं। अतः इंसान की भावनाओ को झकझोर  देनेवाली ताक़त लिये इन शब्दों से दो-एक होने की इच्छा मेरी भी जागने लगी।
कहते हैं लेखक "God Gifted"होते हैं , 'Inbulit Software' की तरह और इसलिए 'Unique' होते हैं,मैं भी इस विचार से 100 फीसदी सहमत हूँ। तब मन में एक कसक रह जाती है और यकायक प्रश्न आ जाता है कि जो 'God Gifted' नहीं हैं,जिनकी हिंदी ज्ञान अधूरी है, जो थोड़ी बहुत ताकझांक, जुगाड़ से Pirated या Duplicate Software होकर हिंदीरूपी 'Operating System' में Installed हो जाते हैं, उनकी भी तो अपनी अलग जगह है,आखिर सब लोग Original Version ही नहीं खोजते हैं, Pirated का भी बहुत बड़ा बाज़ार है।
यह सोचकर मैंने हिंदी में लिखने का Risk उठाया,डर है कि हिंदी के इस हरे भरे मैदान पर 'Hit Wicket' न हो जाऊं! फिर हिम्मत जगती है कि Crease पर रहना या आउट हो जाना तो  खेल का हिस्सा है,जीत हर हाल में मेरी ही होनी है, क्योंकि सफलता या असफलता दोनो ही Case में आप कुछ न कुछ जरूर सीखते हैं।
फिर  मिला इंटेरनेट की दुनिया का ऐसा Plateform जहाँ कोई Reservation नहीं था,जहाँ कोई जातीय रंजिश नहीं थी,जहाँ कोई धार्मिक विभाजन नहीं था,जहाँ आजादी थी, अपने विचारों एवं भावनाओ को पंख देने का और ऊंची उड़ान भरने का,जिसे उनकी भाषा में "Blogging"कहते हैं।
किसी ने कहा टॉपिक Select Karo फिर लिखो,किसी ने कहा Lifestyle पर लिखो,अनानेक Suggestions से गुजरता हुआ में' किंकर्तव्यविमूढ़'हो गया जैसे कोई Computer 'Hang' हो जाता है।
मेरी भावनाएं मुझे अशांत कर रही थीं ,ऐसा क्या लिखूं की वो लोगो को पसंद आ जाये,लोग मेरे Blogs को पढें,अच्छे-अच्छे Comments मिले और मेरी लेखिनी  धूप और बारिश के बीच आसमान में  किसी "सतरंगी इंद्रधनुष"की तरह भव्य रुप ले।
इन सब विचारों के बीच मैं खुद को भावहीन समझने लगा,महसूस हुआ कि जब मैं अपने लेखनी से खुद को खुश नहीं कर सकता तो दूसरों को क्या खुश करूँगा।और इसलिए मेरी लेखनी में निरंतरता बनी रहे इसके  लिए जरूर यह है कि मैं वो लिखू जो मुझे पसंद है,जिसे मैं शब्दों के माध्यम से 'जी' सकूँ, जो मुझे नैसर्गिक आत्मबल दे।
मेरी भावनाओं से सहमति भी होगी और असहमति भी, क्योंकि जीवन का सिर्फ एक पक्ष नहीं हो सकता, फिर भी आने वाले दिनों में हर उस पहलू को छूने का प्रयास करूंगा जिसमें मेरी जीत हो या हार,  "इंसानी जज्बात,इंसानियत,पशु-पक्षी,धरा और इन सबसे ऊपर "हिंदी" की जीत होनी चाहिये।इसमें अगर बूँद भर भी योगदान कर पाया तो मेरी यह यात्रा सफल हो जाएगी।

"कभी भाव लिखता हूँ, कभी जज्बात लिखता हूँ,
कभी जमीं तो कभी आसमां लिखता हूँ।
इस छोर से उस छोर तक ,इस ओर से उस ओर तक,
निर्बाध लिखता हूँ,बेपरवाह लिखता हूँ,जैसा भी लिखता हूँ ,हर वक़्त बेहिसाब लिखता हूँ"।

आभार।

Tuesday, 30 July 2019

Triple -T

समय के निर्बाध गतिशीलता के बीच मनुष्य असंगठित से संगठित,अज्ञान से ज्ञान,विचारशून्य से विचारशील ,असभ्यता से सभ्यता की ओर प्रखर होकर अग्रसित होने लगा।
कहते है जब 'अल्पविकसित'से 'विकसित'होने की राह पर होते हैं तो "विकासशील"नाम का सूर्य बहुत तेज चमकता है और इसी कारण बात उस दौर की है जब समाज अपना एक संगठित आकार ले रहा था।मानव सभ्यता के आरंभ से लेकर वर्तमान समय तक कई सकारात्मक बदलाव आए ,पर जैसे सुख और दुख जीवनरूपी नदी के दो किनारे है ठीक उसी प्रकार समाज में अच्छाइयों के साथ-साथ बुराइयों का भी  समानांतर प्रादुर्भाव हुआ।
1800 ई के आसपास सती प्रथा ने सामाजिक मनःस्थिति ही बदल दी किन्तु 1829 ई में ब्रम्ह समाज के संथापक श्री राजाराममोहन राय के अथक प्रयास से इस कुरीति को खत्म कर दिया गया।इसी तरह कितने ही सामाजिक कलंक को समय दर समय धोया गया।कालांतर में जब "विकास"तेज दौड़ने लगा तो विकासशील समाज अपनी मानसिक अपंगता से बाहर निकलने की पुरजोर कोशिश करने लगा।
जिसका वर्तमान स्वरूप भी देखने को मिलता है।धार्मिक आडम्बर से ऊपर उठकर जब "Tripal-T"यानी तीन तलाक पे आवाज बुलंद हुई तो न जाने कितने ही मुस्लिम महिलाएं अचानक से खुद को सशक्त महसूस करने लगी।
ये कुछ ऐसा ही है जैसा मृतप्राय शरीर को सांसो की मद्धम डोर मिल जाना।आज के Technology के दौर में भी ऐसी प्रथाएं अपना जड़ जमाये रही और विडंबना देखिए कि इसके समर्थन करने वालो की भी संख्या कम नहीं है।
राजनीति जब 'स्वार्थनीति' बन जाये तो समाज ऐसे ही विध्वंस से गुजरता है और व्यक्ति विशेष ही नहीं वरण पूरा का पूरा समाज शोषित होता है।
भारत सरकार के इस सकारात्मक पहल और विपक्ष के असफल प्रयास ने मिलकर भारतीय संसद के इतिहास में एक और 'सती प्रथा'को दफन कर नए समाज की नींव को उर्वरा कर  मजबूत करने का एक और सफल प्रयास किया है।
आशा और उम्मीद ही मानव मात्र का सम्पूर्ण  आधार है जिसके दम पर ही लाखो साल से ये धरा जीवंत है।
आशा है ऐसे ही समाज 'Social Pruifier' से गुजर कर Pure और Transparent सोच का उदाहरण प्रस्तुत करता रहेगा जिससे सामाजिक स्वास्थ्य उत्तरोत्तर प्रगाढ़ बना रहे।

Monday, 29 July 2019

सोने की चिड़ियाँ

इतिहास के पन्नो को उलटेंगे-पलटेंगे तो अनायास ही कई प्रकार के विचारों का काल्पनिक चित्र मानसपटल पर उभरने लगता है।मजबूत तंत्र,शक्तिशाली एवं सुसंगठित सेना तथा कुशल सामाजिक ,सांस्कृतिक और रणनीति का बेजोड़ समिश्रण था उस समय का राजतंत्र।तंत्र चलाने का ताना-बाना  कुशल कारीगरी का एक ऐसा उदाहरण था जिसकी बुनाई  व्यक्ति विशेष न होकर समाज विशेष होती थी।सिंधु घाटी सभ्यता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
बात उन दिनों की है जब हिंदुस्तान "सोने की चिड़ियाँ" हुआ करती थी।साम्रज्य दिनानुदिन चौतरफा अपने परिधि को विस्तारित कर रहा थी।भारतीय राजाओ का परिसीमन विस्तार वहां के लोगो को गुलाम बनाने का न होकर उन्हें अपने राज्य के नागरिक के समान का दर्जा देना होता था।शायद इसलिए महान अशोक निरंतर राज्यविस्तार भी करते रहे और शासन प्रशासन भी निर्बाध चलती रही।
सुना भी है,पढ़ा भी है और देख भी पा रहा हूँ,समय के साथ ये सारी दुनिया भी गतिशील है,कालचक्र चल रहा है साथ ही साथ मानव समाज भी गतिशील है ,नित दिन विकासशील से विकसित होने को अग्रसित है।परन्तु हिंदुस्तान को जरा समझने की कोशिश करता हूँ तो मेरे सारे तर्क कुतर्क हो जाते है लिहाजा इस निष्कर्ष पे पहुचता हूँ कि दुनिया की एक मात्र इतिहास जो विकसित से अविकसित की ओर बढ़ा, वो हमारा हिन्दुस्तांन है।
"सोने की चिड़ियाँ" ने इतना लंबा सफर तय कर लिया कि हिंदुस्तान कब पीछे छूट गया उसे भी पता नहीं चल पाया।
               विश्लेषण के तालाब में जरा सा गोता लगाएंगे तो शासन  के डूब जाने या उबरने का आभास तो हो ही जाता है, साथ ही साथ  यह समझ पाना भी आसान हो जाता है कि परिवार चलना हो या साम्राज्य,दोनो के मूल principle एक ही है।किसी भी परिवार के पतन की शुरुआत तब होती है जब घर का प्रधान दिशाहीन हो जाये ठीक उसी प्रकार किसी देश या साम्राज्य का पतन तब शुरू होता है जब राजा दिशाहीन हो जाये।
कभी कभी आप ऐसे गलती कर देते है जिसके कारण सम्पूर्ण आने वाली पीढ़ी प्रभावित होती है।विजेता अशोक भी इससे अछूते नहीं रह पाए और सुख, शांति और अहिंसा को समाज मे बनाये रखने वाले सबसे बड़े अस्त्र "हिंसा" को छोड़ दिया।
जब शासक ही कमजोर हो जाये तो उस राज्य का विघटन निश्चित है,यही हुआ भी और एक विशाल किला ताश के पत्तों की तरह ढहने लगा।दक्षिण में श्रीलंका से लेकर उत्तर में यूनान और न जानें कितने प्रान्त हिंदुस्तान की विजय गाथा का प्रमाण था सब एक-एक कर टूटते गए और पारिणाम स्वरूप भारत माता के अखंड रूप खंड-खंड और  विकृत होकर आज हमलोगों के सामने है।
हम ऐसे देश के वासी है जहाँ खून के बदले खून की भावना नहीं होती ,परंतु सामने दुश्मन खड़ा हो युद्ध को तब आप उससे शांति की बात नहीं कर सकते।युद्ध ही एकमात्र विकल्प बच जाता है।
शब्दो को विराम दूं इससे पहले निष्कर्ष से थोड़ा पहले की बात   यह है कि दुनिया शांति अहिंसा और भाईचारे से तब चलती है जब आप अशांति ,हिंसा और द्वेष का शस्त्र चलाना जानते हों।
निष्कर्ष अगले अंक में कुछ विशेष तथ्यों के साथ लेकर आऊंगा।
आभार


Sunday, 28 July 2019

प्रातःकाल

प्रातः काल कितनी अलग है आज, कल से,
पत्तो,पेड़ों से टकराती मध्यम शोर करती हवाएं,
जैसे किसी दैवत्व का संदेशा,जैसे शीतलता निश्छल,
जैसे सांसो की डोर सकल अमरत्व से,
प्रातः काल कितनी अलग है आज ,कल से।

कंचन किरण का प्रखर स्वरूप,वो खिड़की से आती किरणों की धार को मुठी में कर लेने कि चाहत, सजीव का सूर्यमुखी हो जाना,मानो ऊर्जावान हो जाना,मानो आशा का अंबार हो जाना,निश्चल मन ,निश्चल विचार कण-कण से,
प्रातः काल कितनी अलग है आज , कल से।

गोरैया गायब है आज 'कल' से ,जैसे रिश्तो की डोर मन से,
चहचहाना , फुदकना,फुसफुसाना, टुकुर-टुकुर ताकना-झांकना,और फिर फुर से उड़ जाना,
कितना सुकू मिलता  उस मधुर तान और गान  से।
प्रातः काल कितनी अलग है आज ,कल से।

भुत, वर्तमान एवं भविष्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है, कल ,आज और  कल,
कल से 'आज' अच्छा या आज से 'कल' बेहतर,मानव मन के हैं फेर बहत्तर,
सुलझ सुलझ कर उलझ गया,समझ न पाया जीवन त्रिकोण
जीवन की राह दिखाने को,मन की गुत्थी सुलझाने को,
सम्पूर्ण धरा बाट जोह रही,आशा की लकीरों के खिंच जाने को,
उल्टी गंगा बहाने को ,अपनाना होगा नया दृष्टिकोण।
भवर जाल से निकलना होगा,निकल न जाये तीर कमान से,
प्रातः काल कितनी अलग है आज , कल से।

कवि मन चाहे कविता बेहतर हो 'आज' कल से और 'कल' आज से,
नए आयाम जुड़े ,शब्दो से खेलूं, वर्णमालाओं में गोते लगाऊँ,
परख कर रचु नित दिन ,मानव जीवन के गीत,जो बेहतर हो कल 'आज'से,
प्रातः काल कितनी अलग है आज ,कल से।