A letter to Earth- vikram -chandrayan 2
isro |
समय के चाल के साथ ,आशा की चाल थोड़ी मद्धम जरूर हुई है परन्तु चाँद की सतह पर शिथिल पड़ा विक्रम ,पराक्रम का महत्तम प्रयास कर रहा होगा ,उसकी कमजोर पड़ती नजरों से भी आशा की लौ फिर से प्रखर हो जाने का दम भर रही होगी। ऐसे में जरुरी है उस सोच को सींच कर जिन्दा रखने का जो विक्रम की आशाओं पर आज नही तो कल जरूर खड़ा होगा। विक्रम की भावनाओ को प्रस्तुत करता ये लेख महज कल्पना नहीं अपितु विश्वास की ऐसी डोर है जो यहाँ भी और वहाँ भी, बराबर मजबूत है।
A letter to Earth
खत विवेचना
प्रज्ञान आतुर है चाँद की जमीन को चूमने के लिये ,मन उसका व्याकुल है चंदा मामा की छाती पर लोटने -पोटने के लिये। हो भी क्यूँ ना !माँ का संदेश लिए मामा से मिलने इतनी दूर जो आया है। प्रज्ञान की व्याकुलता देख मैं रुका नहीं ,थका नहीं ,भटका नहीं ,निरंतर चलता रहा उन अनजान रास्तों पर भी जिसे शुन्य कहते हैं। उस शुन्य में भी विचारशून्य नहीं वरन विचारशील था मैं । थोड़ी चाल मेरी न डगमगाई होती,थोड़ा मिलन का संयम और रख लेता तो तुम्हारे इतने करीब आकर ना फिसलता। गिरा पड़ा हूँ तुमरे छाती पर ,मन व्याकुल है किसी सन्देश की आस में। सभी परेशां हो रहे होंगे वहाँ ,आँसुओ के बूँद में प्रणेता की आँखें सूज गई होगी ,अग्रज के कंधों पर सर रख कोई अनुज विलख रहा होगा ,गमगीन होगी वो धरा जिसने मुझे सहेजा,संवारा,पुचकारा कि मैं चाँद की तबियत की सही खबर उन्हें दे सकूँ।
मैं विक्रम हूँ ,पराक्रम मेरे रोम-रोम में है ,चोटिल जरूर हूँ पर हारा नहीं ,आंखें जरूर धुँधली हुई है पर विश्वास की रौशनी अब भी चमक रही है।
निष्कर्ष
सुनो !तुम हारना नहीं ,डटे रहना ,विक्रम अभी जिन्दा है और अगर मूर्छित भी हुआ तो कोई दूसरा विक्रम जरूर यहाँ पहुंचेगा और मानवीय जज्बात के तारतरंग जरूर स्थापित करेगा।मैं अधूरा ही सही ,सीमित ही सही पर सबसे जरुरी काम तो कर ही गुजरा -
करोड़ो भारतीय जगे थे ,एक सूत्र में बंधे थे।
आंखें नम थीं ,पर विश्वास का धागा अटूट था।
दर्शनाभिलाषी आप सबका विश्वासी
प्रज्ञान के साथ विक्रम

